अबकी बार खुले में शौच पर वार
9 वर्ष पहले
बचपन से ही इकबाल का लिखा ये गीत हम गाते आ रहे हैं लेकिन हर बार कोई ना कोई इसे झूठलाने में लगा रहता है... चाहे सन 84 के दंगे हों
व यहां तक कि उस एक्टर की पीसी... और शाम 8 बजे से लेकर रात 11 बजे तक जो की प्राइम टाइम होता है हर नेशनल चैनल पर डिबेट्स हुए हल कुछ नहीं निकला बस आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा... गड़े मुर्दे निकलने लगे लेकिन क्या उसका कोई हल निकला, नहीं.. एक दो लोग जहां पक्ष में आकर बोलने लगे वहीं कितनो ने उसका खंडन किया... और फिर उस एक्टर पर धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में केस भी दर्ज हो गया... कुछ दिन बीतेंगे और फिर लोग इस बात को
भूल जाएंगे फिर सब एक दूसरे त्यौहारों में शामिल होंगे... आपको लगेगा कि मैंने लोगों के दर्द को देखा नहीं है इसलिए मैं समझ नहीं सकती और ये बात सही भी है लेकिन मेरी upbringing ही ऐसे माहौल में हुई है... मैं डिफेंस बैकराउंड से हूं जहां लोग जाति-पाति, कौम या आप किस राज्य को belong करते हैं ये कोई मायने नहीं रखता... खैर मैं यहां थोड़ी पर्सनल हो गई लेकिन एक चीज़ जिसकी मुझे खुशी है कि ये जो भी वाक्या हुआ उसे लोग थोड़े दिनों में भूल जाएंगे और सचमुच ये गीत फिर हमारी ज़िंदगी में उतर जाएगा मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी हैं हम हिंदोस्तां हमारा...